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रानी पादमावती

रानी पद्मिनी की वीर गथा

सुंदरता की रानी पद्मावती को कौन नहीं जानता अपने कुल गौरव और मर्यादा की रक्षा के लिए मर मिटने वाली उस आदर्श नारी की कीर्ति गाथा आज  भी घर घर मे सुनी जाती है । जीवन की अपेक्षा जीवन मूल्यों को महत्व देने वाली इस वीरांगना की गौरवमई घटना आज भारतीय संस्कृति का एक उदाहरण बन चुकी है । पद्मिनी चित्तौड़ के राजा रतनसेन की पटरानी थी वह सिंहल द्वीप की राजकुमारी थी और अपूर्व सुंदरी थी उसके सौंदर्य की प्रसिद्धि दूर दूर तक फैल गई थी यही अनुपम सौंदर्य उसकी विपत्तियों का कारण बन गया था

 

दिल्ली के बादशाह अलाउद्दीन खिलजी ने जब उस अनंत सुंदरी की चर्चा सुनी तो वह इसे पाने के लिए लालायित हो उठा । रूप का लोभी खिलजी मन मन में उसकी चाहत ने बेचैन रहने लगा और उसे पाने के लिए बेचैन रहने लगा और उसे पाने के उपाय खोजने लगा । जब उसे पता चला कि वह एक भारतीय पतिव्रता नारी है ओर वह भोग विलास , धन वैभव , ताज तख्त, किसी भी लालच में उसकी पत्नी नही बनेगी तो उसने चित्तौड़ पर आक्रमण कर बलात उठाकर उसे अपनी पत्नी बनाने का निश्चय किया । अय्याश खिलजी एक बड़ी सेना लेकर चित्तौड़ पहुंचा और किले को घेर लिया । उधर राजपूत वीरों ने प्रण किया हुआ था की जी जान की बाजी लगा काट भी वे अपनी रानी के मआब सम्मान की रक्षा करेंगे ओर जीते जी खिलजी को किले में पांव भी नही रखने देंगे । खिलजी लंबे समय तक घेरा डाले पड़ा रहा किन्तु दुर्ग पर अधिकार नई कार सका आखिर उस दुष्ट एवं बादशाह ने कुटनीति की चाल चलने की सोची । उसने राजा रतनसेन के पास एक दूत भेजकर संदेश कहलाया की “यदि एक बार रानी पद्मिनी को देखने का अवसर दे दें तोह मैं घेरा उठा कर वापस दिल्ली लौट जाऊंगा ” । दूत से यह संदेश सुनकर राजा रत्नसेन ओर राजपूत वीर क्रोध से दांत पीसने लगे । किन्तु रानी पद्मिनी ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए कहा – “मैं नही चाहती कि मेरे कारण चित्तौड़ बर्बाद हो और मेवाड़ कर वीरों का व्यर्थ खून बहाया जाए।” रानी को समूर्ण राज्य और अपनी प्रजा की चिंता थी।उनकी रक्षा के लिए उन्होंने मध्य मार्ग  अपनाते हुए इस्समस्या का समाधान निकाला और पति रत्नसेन को समझाया कि “यदि अलाउद्दिन शीशे में मेरा मुख देख ले और वापिस लौट जाए तो इसमें आपको कोउ आपत्ति नही होनी चाहिए बिना रक्त बहाये यदि यह आपत्ति ताल जाए तो इसी में चित्तौड़ का हित है।” पद्मिनी की राज्यभक्ति और प्रजा वत्सलता देख कर राजा रत्नसेन इसके लिए तैयार हो गए ओट दूत के द्वारा उन्होंने अपना यह प्रस्ताव खिलजी के पास भिजवा दिया । अल्लाउद्दीन ने इस प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लिया ।

 

और फिर अगले दिन अलाउद्दीन चित्तौड़ के राजमहल में पद्मिनी को देखने के लिए पहुंचा। दर्पण में पद्मिनी के मुखारविंद को देखकर वह आश्चर्य चकित रह गया। ऐसा अपूर्व सौंदर्य !इतने अलोकिक सौन्दर्य की तो उसने कल्पना भी नही की थी। कुटिल ख़िलज़ी के मन मे पद्मिनी को पाने की की लालसा शांत होने की अपेक्षा ओर तीव्र हो गयी। और रत्नसेन जब उसे किले के बाहर तक विदा करने के लिए साथ गया तो अलाउद्दीन ने अपने सैनिकों को संकेत कर उसे बंदी बना लिया। रत्नसेन ने कभी सपने में भी नही सोच था कि एवं बादशाह इतना नीच , छली, ओर कपटी भी हो सकता है। वह तोह उसकी बात पर विश्वास कर के सरल हृदय से उसे विदा करने आया था। उसे नाही मालूम था कि खिलजी बादशाहत के नाम पर एक कलंक है।

 

रतन सेन को बंदी बनाने के बाद अलाउद्दीन ने किले में प्रस्ताव भेजा कि यदि रानी पद्मिनी को उसे सोंप दिया जाए तो राजा रत्नसेन को मुक्त कर दिया जाएगा। रानी पद्मिनी ने यह तोदेख ही लुया था कि खिलज़ी एक नीच व्यक्ति है। और उसके पास एक विशाल सेना है। अतः उसे सिर्फ कूटनीति से ही वश में किया जा सकता है। पद्मिनी ने अपने वीर सेना नायक गोरा से मंत्रणा करके एक कूट योजना बनाई ओर खिलजी को कहला भेजा की “मुझे तुम्हारी शर्त मंजूर है।”किन्तु मेरी भी एक शर्त है, और वह यह कि मैं पहले अपने पति से मिलना चाहूंगी। मेरे साथ मेरी सैकड़ों सुंदर सहचरिया ओर दासियाँ भी आएंगी। अलाउद्दीन पद्मिनी को पाने के लिए बेताब हो रहा था। संदेश सुनकर उसे लगा कि बस अब तो पदमिनि उसे मिल गयी। उसने उत्तर में रानी को कहलवाया की “मुझे तुम्हारी शर्त मंजूर है”। अलाउद्दिन दीवाना हुआ जा रहा था।

 

अलाउद्दीन का उत्तर पाकर रानी पद्मिनी ओर राजपूत वीरों की खुशी का ठिकाना न रहा। उनकी कूटनीतिक योजना रंग ला रही थी। सैकड़ों पालकिया सजाई गई, जिसमे प्रत्येक में दो दो राजपूत सैनिक स्त्री वेश बनाकर बैठ गए और चार चार पालकी ढोने वाले चल रहे थे। इसप्रकार हज़ारो कुटवेषी सैनिको के साथ पदमिनि अपने पति से मिलने के लिए चली। पदमिनि की पालकी के दोनों ओर सर्वश्रेष्ठ वीर गोरा और बादल घोड़ो पर सीगल रहे थे । पालकियों का काफिला अलाउद्दीन के सेना शिविर में पहुंचा । पदमिनि की पालकी में बैठे स्त्री वेश धारि वीर सैनिक ने अपने पति से मिलने का स्वांग रचा। ओर तुरंत राजा रतन सेन को मुक्त कर दिया। इशारा पाते ही राजपूत सैनिक एवं सेना पर टूट पड़े। यवन सेना में भगदड़ मच गई। अलाउद्दीन की पराजय हुई गोरा और बदल की वीरता तथा चतुराई के कारण राजा रत्नसेन सकुशल चित्तौड़ के किले में पहुंच गए।

अलाउद्दीन ने इस अपमानजनक हार का बदला लेने के की सोची। कुछ समय पश्चात शक्ति जुटाकर उसने फिर चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया । भयंकर युद्ध हुआ । इस युद्ध मे राजा रत्नसेन वीरगति को प्राप्त हुआ। अलाउद्दीन को को अब लगा कि अब पद्मावती उसके हाथ मे आ जायेगी। पात्मनि को जब अपने पति के मर जाने का समाचार मिला तो उसने एक विशाल चिटा बनवाई ओर सैकड़ों राजपूत नारियों के साथ जलती चिटा में कूद कर भस्म हो गयी। अलाद्दीन किले को जीतता हुआ एक विजेता के भिमान में भरकर जब पदमिनि को पाने के लिए उसके महल में पहुंचा तो उसे उसकी रख ही मिली। अलाउद्दिन पद्मावती के भस्म होने की सूचना पाकर भौचक राह गया। एक बार लगा कि जैसे पैरो के तले से जमीन खिसक गई हो उसने कभी सोचा भी नही था कि कोई नारी इतना बड़ा बलिदान भी कर सकती है। एक औरत को पाने के लिए अपने और पराये हजारों लोगो का खून बहाने वाला  तथा बादशाहत को कलंकित करने वाला खिलजी सिर नीचा किये खाली हाथों अपने शिविर में लौट गया। ओर फिर दिल्ली को प्रस्थान किया। बादशाहत का इतना स्वार्थपूर्ण दुरुपयोग शायद ही किसी ने किया हो।

 

और अपने कुल गौरव , मर्यादा, आदर्श , सतीत्व की रक्षा के लिए इतना महान बलिदान भी शायद ही किसी रानी ने दिया हो। सती होने कोई अछि बात नही किन्तु यहां पदमिनि की विवशता थी। उसके सामने अपनी मर्यादा की रक्षा का और कोई उपाय नही था ।

पतिव्रता देवी पदमिनि ने जीवन की अपेक्षा अपने जीवन मूल्यों को अधिक महत्व दिया। यही इस घटना की महती प्रेरणा है। अवधि भाषा मे लिखा हुआ पद्मावत नामक महाकाव्य इसी बलिदान गाथा पर आधारित है। जिसके रचयिता प्रसिद्ध सूफी कवि मालिक मुहम्मद जायसी हैं। सूफी कवि इस बलिदान से इतना प्रभावित हुआ कि उसने इस घटना को एक महाकाव्य का रूप दे डाला।

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